इमाम हुसैनः एक परिचय

परिचय की आवष्यकता उनके लिए है जो मोहर्रम के अवसर पर हुसैन-हुसैन की आवाज़े सुनते हैं, पत्र-पत्रिकाओ के मुख्य प्रकाषनों पर मोहर्रम में ‘’हुसैन नम्बर‘’ लिखा देखते है, मगर जानते नही है कि यह हुसैन कौन है? या उनके लिए किसी घोडे़ (षबीहे ज़ुलजनाह) को इस शान से देखते है कि बागें कटी हैं, खून बहा हुआ है, शरीर पर जा बजा तीर लगे हुए हैं अथवा किसी ताबूत की रक्तमय चादर से ढका हुआ देखते हैं और उनकी समझ मे नही आता कि यह किसकी यादगार मनायी जा रही है।

पहली दषा में नाम से व्यक्ति की तलाष होती है और दूसरी दषा में गुणों से व्यक्ति की खोज की तड़प उत्पन्न होती है और यही उपकरण अज़ाए मोहर्रम का वह उज्जवल मार्ग है, जिसके सुरिक्षत रखने को हुसैन के अनुयायी अपने जीवन का सबसे बड़ा और बहूमूल्य खज़ाना समझते है और विरोधीगण इनके मुकाबले में अपनी बुरी भावनाआंे और अनुचित नीतियों को अपने जीवन का मुख्य उद्देष्य समझते हैं।

यह परिचय का वह साधारण पहलू है जिसके लिए अधिक सोच-विचार की आवष्यकता नही, परन्तु अगर तीव्र दृष्टि से देखा जाय तो हज़रत हुसैन इब्ने अली अलैहिस्सलाम के नाम का स्मरण करते है और आप के व्याख्यान को दिनों-रात आरम्भ रखते हैं उन्हं भी प्रायः आपके गौरव को पूरा ध्यान और आपके उस अमर कारनामे की गम्भीरताओं का समुचित ज्ञान नहीं है। इसलिए वह स्वंय भी परिचय के आश्रित हैं। मगर यह पहलू परिचय का वह पहलू हैं, जिसका मूल्य उसी समय अदा किया जा सकता है जब परिचय कराने वाला स्वंय भी इमाम हुसैनअ0 के विषय में पूर्ण जानकारी रखता हो।

हा, केवल यह परिचय उन्ही लोगों के वास्ते है, जो हज़रत इमाम हुसैनअ0 के नाम से बिल्कुल ही अनभिग हैं। ऐसा तो प्रायः कोई षिक्षित ना होगा, जिसने इस्लााम का नाम ना सुना हो, धार्मिक दृष्टिकोण से इस्लाम र्धम संसार के सृष्टि से है और इसके अनुयायियों का नाम मुस्लिम सबसे पूर्व हज़रत इब्राहीम ने रखा और इस कारण से वह मुसलमानो के सबसे प्रथम पूर्वज समझे जा सकते है। हज़रत इब्राहिम के दो बेटे थे। इस्हाक और इस्माईल। हज़रत इस्हाक सिलसिलए बनी इस्राईल के प्रथम पूर्वज थे। जिनमें हज़रत मूसा और हज़रत ईसा प्रसिद्ध धर्म प्रचारक हुए हैं और इन्ही पुरूषो के समय में तौरेत, इन्जील और ज़बूर जैसी आसमानी पुस्तकें प्रकट हुई। दूसरें हज़रत इस्माईल थे, जिन्हे आपके पिता हज़रत इब्राहिम ने आप की माता हाजरा के संग बालकाल्य अवस्था में ही मक्का पहुचा दिया था। जिसमें ख़ान-ए-काबा स्थित है और खान-ए-काबा को बनाने वाले यही पिता पुत्र इब्राहिम और इस्माईल हैं।

इस्माईल के बारह पुत्र थे उनमें साबित और कि़दार की सन्तान हिजाज़ में आबाद हुई और कि़दार की सन्तान में अदनान उत्पन्न हुए। जिनकी सन्तान में नज़र पुत्र कनाना और कथनानुसार क़हर पुत्र मलिक पुत्र नज़र और कथनानुसार कुसै पुत्र किलाब पुत्र मुर्रह पुत्र काब पुत्र लुई पुत्र गा़लिब पुत्र फहर की सन्तान कुरैष के नाम से प्रसिद्ध हुई।

कुसै पुत्र किलाब ने बड़ा नाम उत्पन्न किया और बड़े नामी काम किये। उन्होने विधानभवन (दारून्नदवह) के नाम से एक भवन बनवाया। जिसमें पंचायती कार्य किये जाते थे। जनता का रहन-सहन, कर की वसुली और हाजियो के खाने पीने का प्रबन्ध किया तथा विधान आदि पारित किये। उन्होनें शराब पान को बुरा बताया तथा उसकी बुराईयो को उचित रूप सं स्पष्ट किया। कुसै के पुत्रो में अब्दे मनाफ अपने कार्य और गुणो के कारण अपने पूर्वजों के उचित उत्तराधिकारी थे और इनके पुत्रों मे हाषिम योग्य और प्रभावषाली थे। काबे की पवित्र सेवायें, हाजियों के खाने-पीने और रहने आदि का उत्तरदायित्व भी आपके जि़म्मे था, जिसे आपने बड़ी योग्यता से निभाया। इनमे मुका़बले में उमैया पुत्र अब्दुल शम्स जो बनी उमैया का पूर्वज था। असफल होकर अपने देष को छोड़कर शाम की ओर चला गया और वही अपना मोर्चा लगाया।

हाषिम इनकी पदवी इस कारण से हुई कि इन्होंने अकाल के समय मे मक्का के निवासियों को रोटियों के टुकड़े शोरबे मंे भिगो कर खिलाये! अरबी में हष्म चुरा करने वाले को कहते है। हाषिम के बेटे अब्दुल मुत्तलिब थे जो उच्चता, तेजस्व और प्रसिद्धि में अपने पूर्वजो से भी आगे थे और सय्युदल बतहा के नाम से प्रसिद्ध हुये, जो उनकी सन्तान मे शेष रह गया और उनही की सन्तान है जो सादात कहलाती हैं।

अब्दुल मुत्तलिब के दस पुत्रो में से दो पुत्र अब्दुल्लाह और अबुतालिब थे। अब्दुल्लाह के पुत्र इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा, जिन्हाने संसार को एकेष्वरवाद की षिक्षा दी और मूर्ति पूजा, अधिकार पूजा, धन पूजा, बल्कि हर उस वस्तु के पूजा का विरोध प्रकट किया जो अल्लाह की ओर से ध्यान हटाकर अपनी ओर आकर्षित करता है।

अबुतालिब के सुयोग्य पुत्र हज़रत अली थे। जो इस्लाम के प्रचार मे मुहम्मद साहब के साथ सदैव रहते थे। यहाँ तक कि जब इस्लाम के विरोधियों ने सैनिक शक्ति के साथ मुसलमानो पर चढाई की और बद्र व ओहद, खन्दक और खै़बर की लड़ाइयाँ हुई तो इन सभी युद्धों में न्याय व सच्चाई की ईष्वरीय शक्ति के साथ हज़रत अली की तलवार थी, जो हर स्थिती में इस्लाम की सफलता का कारण बनी रही।

हज़रत मुहम्मद साहब की केवल एक पुत्री थी फातिमा ज़हरा जिनका उनके उच्चतम आदर्षाें के कारण आप इतना आदर करते थे कि जब वह आपके समीप आती थीं, तो आप आदरवष खड़े हो जाते थे और अत्याधिक हदीसें आपने इनके गौरव से सम्बन्धित बयान किये, जिनमे एक यह भी थी कि वह स्वर्ग कि तमाम स्त्रियों की प्रधान और धार्मिक स्त्रियों की भी प्रधान हैं बताया कि फ़ातिमा मेरे अंग का एक भाग है। इनकी षादी हज़रत अली से सम्पन्न हुई और इन्ही दोनों पवित्र और आदरणीय माता-पिता से दो सुयोग्य पुत्र उत्पन्न हुये। एक इमाम हसन और दूसरे इमाम हुसैन। जिनका नाम हुसैन-हुसैन के शब्दों मे मुहर्रम के अवसर पर अधिकतर नगरों और ग्रामों के मकानों और लगभग प्रत्येक मार्ग पर सुनाई देता हैं।

हज़रत इमाम हुसैन इस्लाम धर्म के प्रर्वतक मुहम्मद साहब के नाती तथा हज़रत अली के पुत्र थे, आप का जन्म 3 षाबान सन् 4 हिजरी को मदीने में हुआ। आपका जीवन इस्लामी षिक्षा का पूर्ण आर्दष था और षिया मुसलमान आपको तीसरा इमाम अर्थात मुहम्मद साहब का तीसरा उत्तराधिकारी और रसूल के पष्चात् खुदा की ओर से नियुक्त किया हुआ तीसरा धर्म-प्रदर्षक मानतें है।

षाम का षासक यज़ीद, जो बड़ा ही चरित्रहीन, शराबी, झूठा और विष्वासघाती था। आप से अनुचित ढंग से अपनी आज्ञाओं हेतु प्रण लेना चाहता था जिसे आपने अस्वीकार कर दिया। इसी कारण यज़ीद की सेना ने आप पर चढाई कर दी और दस मोहर्रम इकसठ हिजरी को कर्बला की पवित्र भूमि पर तीन दिन की भूख और प्यास में आपके जीवन दानी मित्र, नवयुवक व कम आयु पुत्र, भाई, भतीजे, भाँजे यहँा तक कि दूध पीता छः महीने का बालक तक शत्रुओं की तलवारों, नैज़ों और तीरों का निषाना हो गये।

आपके खे़मों में आब लगा दी और आपके पारिवारिक सदस्यों को जिनमें केवल एक पुरूष अर्थात् रोगग्रस्त पुत्र जै़नुल आबदीन थे और जिन में इस्लाम धर्म के प्रर्वतक मुहम्मद साहब की अपनी नवासियाँ तक मौजूद थीं बन्दी बनाकर अत्यन्त शत्रुता तथा अमनुष्यता के साथ कर्बला से कूफ़ा और कूफ़ा से शाम ले जाये गये।

यही दुखद और हृदय विदारक कारनामा है, जिसकी याद प्रत्येक वर्ष मुहर्रम मास में जीवित की जाती है और उसकी याद में पत्र-पत्रिकाओं के मुख्य प्रकाषन ‘‘हुसैन नम्बर’ अथवा ‘‘मुहर्रम नम्बर’ के नाम से प्रकाषित किये जाते हैं।

हुसैन क्या चाहते थे?

फूलों की सेज पर सुख भरी नींद से सोना जितना सरल है शोलों की शय्या पर क्षण भर लेटना उतना ही कठिन है। संसार में सुख की कामना प्रत्येक मनुष्य करता है लेकिन दुःख और आपत्तियों का कोई स्वप्न भी नहीं देखना चाहता। शरीर के किसी भी भाग में चुभा हुआ कांटा जब तक निकल नहीं जाता तब तक मनुष्य को विश्राम नहीं मिलता। तब कौन ऐसा होगा जो जीवन पर्यन्त अपने हृदय में कांटों का जाल चुभाए रखने की कल्पना भी कर सकता हो। मनुष्य जब किसी श्रेष्ठ या आदर्श रूप कार्य को करने चलता है तो उसके सामने बड़ी-बड़ी बाधाएं आती हैं, आंधियां और तूफ़ान आते हैं लेकिन जो उनका साहस से सामना करता हुआ आगे बढ़ता जाता है अपने लक्ष्य की प्राप्ति में सफ़ल होता है। आकाश उसके ऊपर फूलों की वर्षा करता है। मनुष्य सदा उसके नाम की माला जपता है।

कर्बला की घटना एक ऐसी दुःख भरी कहानी है कि जिसके स्मृति मात्र से रोमान्च हो जाता है। कर्बला के रण क्षेत्र में आदर्श पुरूषों ने सत्य और न्याय की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर मानव जाति को एक नवीन जीवन प्रदान किया है तथा जब तक इस संसार में मानव की सत्ता होगी तब तक उन्हें इस घटना से जीवन मिलता रहेगा। लोग उसकी याद कर यही कहते रहेंगे कि आह! कर्बला युद्ध के मैदान में न्योछावर होने वालों की कहानी में जि़न्दगी बरसती है। यह बिल्कुल सत्य है कि हज़रत इमाम हुसैन ने अपने त्याग और तपस्या से अंधी आंखों में प्रकाश भर दिया है।

हज़रत इमाम जिनपर कर्बला की घटना का इतना बड़ा महत्व आधारित है वे क्या चाहते थे? यही बतलाने के लिए हमने अपनी लेखनी उठाई है। कर्बला के रणक्षेत्र में हज़रत इमाम हुसैन अ. को सपरिवार बलिदान हुए आज (लगभग) 1400 वर्ष बीत चुके हैं। इतने लम्बे समय में न मालूम कितने परिवर्तन हुए। मनुष्य के जीवन को झकझोर डालने वाले न मालूम कितने तूफ़ान आए और चले गये, बड़ी-बड़ी क्रान्तियां हुईं, लेकिन लोगों के दिलों में हुसैन अ. की याद ताज़ी बनी रही। काल चक्र इसे मिटा न सका। प्रत्येक के होंठों पर हुसैन का नाम है और हर एक हुसैन के उद्देश्य को जानना चाहता है। हुसैन किसी अपने निजी लाभ के उद्देश्य को लेकर नहीं चले बल्कि वे समस्त मानव जाति के हित के लिए था। इसी लिए मनुष्य ने आप की स्मृति को अपने हृदय में ऐसा स्थान दे दिया है जो कि कभी हट नहीं सकती। अब हुसैन अ. के उद्देश्य का पूर्ण चित्र आपके सामने रखना है।

हज़रत इमाम हुसैन अ. के कुछ समय पहले हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ने सभ्यता, संस्कृति और धार्मिक जीवन में एक नवीन क्रान्ति का सन्देश पंहुचाया था। जिसका नाम था ‘’इस्लाम ‘’ । इस्लाम ने लोगों के जीवन में अनेकों महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। उसने स्वार्थ के नशे में डूबी हुई मानव जाति को एक दूसरे के साथ भाई चारे का व्यवहार करने का पाठ पढ़ाया। ‘‘सब अल्लाह के बन्दे हैं, ऊंच-नीच का विचार करना यह मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है‘’ की शिक्षा देकर लोगों के दिलों में एक दूसरे के प्रति प्रेम की भावना उत्पन्न की। और केवल अल्लाह की उपासना करने का उपदेश दिया।

जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत तो सभी जानते हैं। इसी का सहारा लेकर बलवान निर्बलों पर अत्याचार करता रहा और आज भी जब कि मनुष्य अपने को सभ्यता की अन्तिम चोटी पर बैठा हुआ मानता है इसका प्रभाव कम नहीं हुआ। कहने का तात्पर्य यह है कि आज भी बलवान अपने से कमज़ोर पर हर तरह के अत्याचार करता है। इस मानवता के दामन की आज धज्जियां हवा मे उड़ती हुई दिखाई देती हैं। अरब जाति के लोगों में उस समय अनेकों दुर्गुण पैदा हो गये थे। वे लोग दूसरी जाति के लोगों को घृणा की दृष्टि से देखते थे। वे स्वयं वैधानिक कामों में छोटे बड़े, ऊँच-नीच की बात सोचते थे। यदि किसी फौजदारी कानून के अन्तर्गत किसी निम्न श्रेणी के मनुष्य को कठिन दण्ड दिया जा सकता था। तो उसी क़ानून के अन्तर्गत ऊंची श्रेणी के मनुष्य को बिना दिये छेड़ दिया जाता था या तो बहुत साधारण दे दिया जाता था। बड़े आदमियों की जानें बहुत मंहगी थीं ओर छोटे आदमियों की बहुत सस्ती। जो मनुष्य का घर धन धान्य से भरा पूरा होता उसका जीवन बड़े ठाटबाट का होता, उसके समुदाय में बहुत लोग होते उसी को उच्च श्रेणी का आदमी माना जाता। यही गुण अरब जाति के चिन्ह माने जाते थे तथा जिनके पास ये सब गुण न होते वे निम्न श्रेणी के लोग कहे जाते। अरब जाति वाले इन निम्न श्रेणी के लोगों के साथ पशुओं जैसा व्यवहार किया करते थे।

इस प्रकार धन, जन, और शानो-शौकत के आधार पर अपने को ऊंचा समझ बैठने से ही अरब जाति अपराध और पाप के अंधेरे कुएं में गिर चुकी थी। हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ने सबसे पहले इसी छोटे बड़े ऊँच नीच के भेद भावों को समाप्त किया तथा जाति वर्ग की भिन्नता को मिटाया। और मनुष्य को दूसरों से ऊंचा होने की एक नयी कसौटी संसार के सामने रखी। आपने बतलाया कि संसार के सभी मनुष्य अल्लाह के बन्दे होने के नाते बराबर हैं। लेकिन मनुष्य के संसार में अनेकों कर्तव्य होते हैं। जो मनुष्य अपने कर्तव्यों का भली भांति सच्चाई के साथ पालन करता है वही अपने को दूसरों से ऊंचा या बड़ा कहलाने का अधिकारी होता है। उसपर अल्लाह की विशेष कृपा होती है। इसके विपरीत जो मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करता है वह छोटा या नीच कहलाता है।

आपके इस कथन से ठाटबाट, धन सम्पत्ति के आधार पर बड़ा या उच्च श्रेणी का मनुष्य मानने वालों के हृदय पर बहुत बड़ी चोट लगी। वे सब लोग आपके विरूद्ध हो गये और इस्लाम का दृढ़ता के साथ सामना करने लगे, तथा इस्लाम के प्रचार को बन्द कराने के लिए प्रयत्न करने में हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा को अनेकों प्रकार के दुःख दिये। अनेकों स्थानों पर हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा स0 को अपने विरोधियों से लड़ना पड़ा। इसी से सम्बन्ध रखने वाली बद्र, ओहद और ख़न्दक़ की लड़ाइयां प्रसिद्ध हैं। रसूल स. के विरूद्ध लड़ने वालों में बनी उमय्या क़बीले का नेता अबुसुफि़यान सबसे आगे था। कठिनाइयां चाहे जितनी उठानी पड़े लेकिन अन्त में विजय सत्य की ही होती है। इन संघर्षों में हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा की विजय हुई और विरोधियों को आपके सामने घुटने टेक देने पड़े।

पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा स. के समय में इस्लाम के सिद्धान्तों में परिवर्तन करने का किसी को अवसर नहीं मिल सकता था। वे इस्लाम के सिद्धान्तों का बड़ी दृढ़ता के साथ स्वयं पालन करते थे और दूसरों को उसी तरह दृढ़ता ओर विश्वास के साथ पालन करने पर ज़ोर देते थे। जब हज़ारों की संख्या में सभी कबीलों से निकल-निकल कर लोग इस्लाम की शरण में आना गर्व की बात समझते थे उस समय भी आप भिखारियों के साथ उठते-बैठते, फटे, कपड़े पहनते तथा मिलने आने वाले के साथ भाई चारे का व्यवहार करते थे। आपने अपनी मस्जिद में अज़ान देने के लिए एक हब्शी को नियुक्त किया था जिसे अरब जाति वाले गिरी हुई दृष्टि से देखते थे। लेकिन रसूल स. के हृदय में उस हब्शी के लिए बन्धुत्व के नाते सम्मान और प्रेम था। आपने अपनी फुफेरी बहन का विवाह एक आज़ाद किए हुए गुलाम के साथ कर दिया। आगे चल कर इसी गुलाम के बेटे को अरब की ऊंची जाति वालों की सेना का सेनापति बनाया। इस पर लोगों को बुरा मालूम हुआ लेकिन आपने किसी की भी बात न सुनी।

जिन लोगों का रसूल स. बहुत आदर करते थे अधिकतर वे लोग निर्बल, निर्धन और विदेशी थे। सलमान फारसी जो ईरान के निवासी थे उनके साथ आपका ऐसा अच्छा व्यवहार था जैसा दूसरों के साथ होना कठिन था। ये सब काम रसूल इस लिए करते थे जिससे अंधकार में भटके हुए मनुष्यों के विचारों और मस्तिष्क में परिवर्तन हो सके और मानवता फिर कंचन के समान चमक उठे। बड़े दुःख के साथ कहना पड़ता है कि रसूल स. के जीवन के दिन शीघ्र ही समाप्त हो गये। इस संसार में उनकी कुछ दिन की और आवश्यकता थी परन्तु अल्लाह की इच्छा के आगे किसी की कुछ नहीं चलती। वे संसार से सदा के लिए चले गये परन्तु आपके जीवन की एक एक घटना मानव जीवन में मार्ग प्रदर्शित करती रहती है। आपके जीवन काल में ही इस्लाम इतनी शक्ति पा चुका था कि वह दुनिया वालों के लिए एक आदर्श बन गया था और जिसे कुछ लोग व्यवहारिक रूप से पालन भी करने लगे थे।

जनता की विचारधारा में परिवर्तन लाने के लिए एक लम्बे समय की आवश्यकता होती है। क्योंकि जो भाव या विचार मनुष्य के मस्तिष्क में बैठ जाते हैं उनका निकलना सरल नहीं होता है। इसलिए इस्लाम के फैलने में भी एक लम्बे समय की आवश्यकता हुई। रसूल स. के मृत्यु के कुछ दिन पश्चात बनी उमय्या की शक्ति की नींव पड़ी। प्रारम्भ में इसकी शक्ति एक सूबे की गवर्नरी के रूप में थी लेकिन धीरे धीरे इसका प्रभाव निरन्तर बढ़ता चला गया। शाम में बनी उमय्या का परिवार बड़ा शक्तिवान हो गया था और उसकी शक्ति बराबर बढ़ती जा रही थी इस शक्ति से इस्लाम के पैग़म्बर की हमेशा मुठभेड़ हुआ करती थी। लेकिन अन्त में इस शक्ति को पैग़म्बर की शक्ति के सम्मुख सिर झुका देना पड़ा था।

पाठक बड़ी सरलता से यह अनुमान लगा सकता है कि यदि इस कबीले के हाथ में राज शक्ति होती तो ये लोग क्या करते? जिस ऊंच नीच के भेद भाव को इस्लाम के पैग़म्बर ने मिटाने में अपनी समस्त शक्ति लगा दी थी तथा अनेकों प्रकार की आपत्तियों का सामना किया था वही फिर अपना स्थान जमा लेता। लेकिन सौभाग्य से इसकी शक्ति इस्लाम की छाया में आ गयी और इस्लाम उसका प्रतिनिधि बन गया था। इसलिए इस कबीले ने अपने उद्देश्य को इस्लाम की छत्रछाया में रहकर गुप्त रूप से अपने उद्देश्य की पूर्ति करने का विचार किया। यदि वे खुल्लमखुल्ला अपने उद्देश्यों को पूरा करने का प्रयत्न करते तो यह उनके लिए बड़ा भयंकर परिणाम सिद्ध होता क्योंकि इस्लाम के सिद्धान्तों के सामने उनकी बात सुनने के लिए कोई तैयार न होता।

कुछ लोगों ने समझा कि इस्लाम की सादगी और उसके भाई चारे के स्थान पर साम्राज्यवाद जन्म ले रहा है और पूंजीवाद की नीव पड़ती जा रही है। लोगों ने इसका विरोध किया। इसका परिणाम यह हुआ कि अबुज़रग़फ्फारी का देश निकाला हुआ, रब्ज़ह को जंग में भेज दिया गया, रसूल स. इस संसार से चल बसे।

समय ने पलटा खाया। इस्लाम का शासन हज़रत अली अ. के हाथों में आया। अतः इस्लाम के सिद्धान्तों का पुनः प्रचार आरम्भ हुआ। इसलिए विरोधियों ने आपको विद्रोह के विरूद्ध आपको इस प्रकार लड़ाइयों में उलझा दिया कि आप अपने लक्ष्य को पूरा न कर सकें। अन्त में हज़रत अली अ. का सिर एक मस्जिद में उतार दिया गया। आपके मारे जाने के बाद आपके पुत्र हसन अ. को इस्लामी शासन का अधिकार मिला। इस समय तक शाम की सरकार की शक्ति बहुत बढ़ गयी थी। इस लिए आपने देखा कि युद्ध के द्वारा हमें सफलता नहीं मिल सकती है। अतः उनसे सन्धि करके उनकी हिंसा प्रवृत्ति का दमन किया तथा दूरदर्शिता से काम लेकर सन्धि के साथ यह शर्त लगा दी कि शाम के शासक को अपने पश्चात किसी को उत्तराधिकारी बनाने का अधिकार न होगा। इसके पश्चात शासन बनी हाशिम को प्राप्त होगा। यह शर्त ऐसी थी कि जिसमें भविष्य बहुत कुछ हज़रत हसन के हाथों सुरक्षित था।

उनका विचार यह था कि इसके बाद शाम का शासन बनी हाशिम के हाथ आ जाएगा। लेकिन राजनीति में सच्चाई तथा प्रतिज्ञा पालन का कोई महत्व नहीं है। अनेकों शर्तें तय होती हैं और तोड़ दी जाती हैं सन्धि पत्र लिखे जाते हैं पर वे रद्दी काग़ज़ की टोकरी में पड़े दिन काटा करते हैं। अतः वही हुआ जिसकी सम्भावना थी। सन्धि की शर्तों का पालन करना तो दूर रहा। उल्टे हज़रत हसन को विष खिलाकर उनकी हत्या कर दी गयी। यह भी एक बलिदान था जो इस्लामी संस्कृति को जीवित रखने वाले हुसैन अ. शेष रहे। प्रत्यक्ष रूप से तो आपको ऐसे कुसमय में कोई भी क़दम आगे बढ़ाने का अवसर नहीं था। जिस गिरोह को लेकर शाम की शक्ति का सामना किया जा सकता था वह पूरा सन्धि के पश्चात तितर बितर हो गया था तथा अब उसके पुःनः संगठित होने की कोई सम्भावना भी नहीं थी। इस्लाम के सिद्धान्तों के विपरीत विरोधियों की चालों को देखकर हज़रत हुसैन अ. मन मसोस कर रह जाते थे पर कर ही क्या सकते थे, विवश थे। तथा आप इस प्रतीज्ञा में थे कि देखें शाम का शासक मुआविया अपने उत्तराधिकार के लिए क्या करता है।

इससे यह न समझना चाहिए कि इस प्रतिक्षा की अवधि में अपने अधिकारों को चाहने वाले बिल्कुल चुप बैठे थे। अर्थात् सन्धि की शर्तों के अनुसार लोगों की आवाज़ें कभी-कभी बुलन्द होती कि मुआविया को अपने बाद किसी को उत्तराधिकारी बनाने का अधिकार नहीं है! परन्तु उनकी आवाज़ें इस तरह दबा दी जाती थीं जिस प्रकार हिटलर ने अपने विरोधियों की आवाज़ों को बन्द कर दिया था। इस सिलसिले में अर्म बिन हुमुक़ ख़ुजाई और हुज्र बिन अदि तथा उनके दस ग्यारह साथियों के साथ बहुत बुरा व्यवहार किया गया। इन लोगों की शाम की सरकार से कोई शत्रुता नहीं थी वरन् केवल सिद्धान्तों की भिन्नता थी। शाम की सरकार के सिद्धान्तों के विरूद्ध सच्चे इस्लामी सिद्धान्तों के पालन पर जोर देने के कारण इन्हें अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा। हज़रत इमाम हुसैन ने इन दुर्व्यवहार का विरोध तो अवश्य ही किया परन्तु साथ ही साथ यह भी देखते रहे कि अन्तिम शर्त का क्या परिणाम होता है। कुछ दिनों के पश्चात् वह समय भी आ गया। शाम के शासक अमीर मुआविया ने हसन के साथ की शर्त के विरूद्ध अपने बेटे यज़ीद को अपने राज्य का उत्तराधिकारी बनाया हज़रत इमाम हसन ने जिस शर्त को अपने भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए आधार बनाया था वह भी नष्ट हो गयी।

हज़रत इमाम हुसैन अ. ने यह अनुभव किया कि यज़ीद जो कि उनका विरोधी था, उसके कारनामे खुल्लम खुल्ला इस्लाम के विरूद्ध विद्रोह के शोले थे। मुआविया भी समझते थे कि इस मामले में हुसैन के व्यक्तित्व का सबसे बड़ा सम्बन्ध है इस लिए उन्होंने हज़रत हुसैन को अपनी ओर मिलाने का प्रयत्न किया। परन्तु वे अपने प्रयत्न में असफल रहे। इमाम हुसैन ने बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि मैं इन बातों के बिल्कुल विरूद्ध हूं। आपके सन्धि के प्रस्ताव को अस्वीकार करने पर कोई कठोरता का व्यवहार नहीं किया। मुआविया की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र यज़ीद उसका उत्तराधिकारी हुआ। उसने सबसे पहले हुसैन से धार्मिक शासक होने का अधिकार किस प्रकार प्राप्त किया …………..उसने मदीना के गवर्नर को पत्र में लिखा कि या तो हुसैन अ. से धार्मिक शासक होने का अधिकार छीन लो या उनकी हत्या कर दो। हुसैन के विरूद्ध उठाया जाने वाला यह पहला हिंसात्मक पग था। हुसैन अ. इसके लिए बिल्कुल तैयार थे। उन्होंने बड़े गर्व से कहा कि चाहे मेरे प्राण चले जायं परन्तु मैं इस असत्य मार्ग पर चलने वाले शासक के आगे सिर झुकाना अपने स्वाभिमान के विपरीत समझता हूं।

यह ऐसा समय था कि जब लोगों की ज्ञान शक्ति बिल्कुल नष्ट हो चुकी थी। वातावरण बिल्कुल शान्त था। जिन लोगों से विरोध करने का सन्देह था उनमें से किसी का गला घोंट दिया गया था किसी की मानसिक शक्ति को खरीद कर उसके मुंह में ताले लगा दिये गये थे सोने चांदी से भरी थालियांें को देख कर बड़े बड़ों के हृदय डाँवाडोल हो गये थे। ऐसे समय में हुसैन उस अन्तिम काम के लिए तैयार हो रहे थे जिसके द्वारा बनी उमइय्या के साम्राज्यवाद का महत्व धराशायी हो जाय।

इमाम हुसैन के लिए यह असम्भव था कि वह राज शक्ति का सामना शक्ति से करते। आपने युद्ध का एक नया ढंग सोचा। संसार ने उनसे पूर्व ऐसा युद्ध का नियम नहीं देखा था। वही इसके उद्देश्य के लिए अधिक लाभदायक था। वे अच्छी तरह जानते थे कि मुसलमानों की आखों पर पर्दे पड़ गये हैं, इनकी बुद्धि कुन्ठित हो गयी है। उनके ज्ञान पर अज्ञान का पर्दा पड़ गया है। उनमें यह सोचने की शक्ति शेष नहीं रह गयी थी कि बनी उमइया के कर्म इस्लाम के बिल्कुल विरूद्ध हैं। इसलिए हुसैन अ. चाहते थे कि मुसलमानों को ज्ञान प्रकाश देकर उनकी आंखों के सामने से अज्ञान का पर्दा उठा दिया जाय उन्हें सच्चाई दिखाई दे जाये। उनके सामने इस्लाम का असली रूप रखा जाय।

हज़रत इमाम हुसैन अ. ने इसके लिए सेना एकत्र नहीं की। आपने उन सत् पुरूषों की खोज की जो कि सही रूप में इस्लाम के प्रतिनिधि थे, जिनकी सज्जनता और सच्चाई को प्रत्येक मनुष्य स्वीकार करता था। उन्होंने रसूल स. के परिवार के युवक, बालक तथा नवजात शिशु को भी अपने साथ लिया। तथा रसूल स. के घराने की स्त्रियां जिनमें रसूल स. की सगी नातिन भी थीं अपने साथ में लिया। हुसैन अ. ने अपने शत्रुओं की प्रवृत्तियों को भली भांति समझ लिया था कि वे उनपर कभी भी दया और सहानुभूति नहीं दिखा सकते। हज़रत इमाम हुसैन अ. ने अपने साथ जो सामान लिया था वह सब हुसैनी उद्देश्य की पूर्ति में व्यय हो गया।

बूढ़ों के सिर काट लिए गए, युवकों को मृत्यु की गोद में सुला दिया गया, बच्चों के प्राण ले लिये गये, शत्रु के अत्याचार और बर्बरता का अन्तिम तीर शेष था। हुसैन अ. ने इसके लिए भी लक्ष्य खोज निकाला। रबाब की गोद से 6 महीने का बच्चा ले लिया। सबसे अन्त में अपनी गर्दन को भी सामने कर दिया। आपकी मृत्यु के बाद शहज़ादियों को बन्दी बना लिया गया। यह सब जो कुछ किया वह बहुत समझकर किया गया। हुसैन अपने लक्षय की प्राप्ति में सफ़लता पा सके। इन बलिदानों से मुसलमानों की आंखे खुल गयीं। उन्होंने वास्तविकता को पहचान लिया। इस्लाम और यज़ीदियत दुध और पानी की तरह अलग अलग हो गये। हुसैन बस यही चाहते थे कि लोग इस्लाम को पहचान लें……………समझ लें कि इस्लामी संस्कृति वही नहीं है जो दमिश्क की राजधानी में दिखाई देती है। जहां शराब की बोतलें रात दिन खुला करती है। तथा वेश्याओं का झुंड अंगड़ाइयां लिया करता है। जहां समस्त प्रजा से धन लेकर ख़लीफ़ा की रंग रलयों में व्यय किया जाता है। जहां ग़रीबों की आवाज़ें कोई सुनने वाला नहीं है, जहां न्याय का गला घोंटा जाता है।

हुसैन ने दिखला दिया कि इस्लाम की संस्कृति वह है जो कर्बला के मैदान में ला खड़ी की गयी। जहां एक हब्शी गुलाम भी घायल होकर घोड़े से गिरता है और इमाम को पुकारता है तो इमाम उसके सिरहाने जाते हैं तथा उसके सिर को उठाकर अपनी गोद में रखते हैं। इस प्रकार उस ग़ुलाम की आत्मा स्वामी की गोद में पड़े हुए शरीर से सदा के लिए अलग हो जाती है। यज़ीद के समान शक्तिवान उनके शासक हो सकते हैं तथा प्रत्येक जाति में उत्पन्न हो सकते हैं परन्तु हुसैन के समान सत्य की रक्षा में सपरिवार बलिदान होने वाले विरला ही जन्म ले सकता है। हुसैनी मिशन जो कर्बला के मैदान में अपने उद्देश्य की पूर्ति कर सका वह प्रत्येक काल में यज़ीद के समान शक्तिवान शासकों की पराजय के लिए पर्याप्त है परन्तु इसके साथ एक शर्त यह है कि संसार के लोग हुसैन अ. के कर्मों को स्मरण रखें तथा उस से शिक्षा प्राप्त करें।

यही है वह (अमर) बलिदान जिसकी याद मुहर्रम में हर साल मनायी जाती है और इस तरह कर्बला के अमर शहीदों का बरसोबरस शोक मातम होता है जो साढ़े तेरह सौ साल से सम्पन्न है और निश्चय ही जब तक आकाश पाताल है यह ग़म स्थापित रहेगा।